हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.75.3

कांड 6 → सूक्त 75 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 75
एतु॑ ति॒स्रः प॑रा॒वत॒ एतु॒ पञ्च॒ जनाँ॒ अति॑ । एतु॑ ति॒स्रोऽति॑ रोच॒ना यतो॒ न पुन॒राय॑ति । श॑श्व॒तीभ्यः॒ समा॑भ्यो॒ याव॒त्सूर्यो॒ अस॑द्दि॒वि ॥ (३)
इंद्र के द्वारा प्रेरित हमारा शत्रु तीनों भूमियों और निषाद आदि पांच जनों को पार कर के दूर वहां चला जाए, जहां से वापस न आए. जब तक सूर्य आकाश में रहे, तब तक वह अनेक वर्षो तक न लौटे. (३)
Inspired by Indra, our enemy should cross the three lands and five people like Nishad and go away from where they do not come back. As long as the sun was in the sky, it did not return for many years. (3)