हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.84.1

कांड 6 → सूक्त 84 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 84
यस्या॑स्त आ॒सनि॑ घो॒रे जु॒होम्ये॒षां ब॒द्धाना॑मव॒सर्ज॑नाय॒ कम् । भूमि॒रिति॑ त्वाभि॒प्रम॑न्वते॒ जना॒ निरृ॑ति॒रिति॑ त्वा॒हं परि॑ वेद स॒र्वतः॑ ॥ (१)
हे रोगाभिमानिनी पाप की देवी! घाव के रोगों से उत्पन्न बंधनों से छूटने के लिए मैं तुम्हारे भयानक मुख में हवि डालता हूं तथा घाव को धोने के लिए यह हवि ओषधि युक्त जल प्रयोग करता हूं. तुम्हें ज्ञानहीन जन पृथ्वी समझते हैं. तुम्हारा स्वरूप जानता हुआ मैं सभी प्रकार निर्त्रति अर्थात्‌ सभी रोगों का कारण जानता हूं. (१)
O goddess of sin! I put havi in your terrible mouth to get rid of the shackles caused by wound diseases and use this medicine-rich water to wash the wound. You are considered to be the earth of the knowledgeless. Knowing your nature, I know all kinds of nirtrati i.e. the cause of all diseases. (1)