अथर्ववेद (कांड 6)
वात॑रंहा भव वाजिन्यु॒ज्यमा॑न॒ इन्द्र॑स्य याहि प्रस॒वे मनो॑जवाः । यु॒ञ्जन्तु॑ त्वा म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दस॒ आ ते॒ त्वष्टा प॒त्सु ज॒वं द॑धातु ॥ (१)
हे रथ के जुए में जुते हुए अश्व! तू वायु के समान तेज चलने वाला बन. इंद्र की प्रेरणा होने पर तू मन के समान वेग से गंतव्य पर पहुंच. सारे संसार को जानने वाले उनचास मरुद्गण तुझ से मिल जाएं एवं त्वष्टा देव तेरे चरणों को वेग प्रदान करें. (१)
O horse plowed in the yoke of the chariot! You become as fast as air. When you are inspired by Indra, you reach the destination with the same speed as the mind. May forty-nine maruds who know the whole world meet you and may Tvashta Dev give speed to your feet. (1)