हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.117.1

कांड 7 → सूक्त 117 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 117
शुम्भ॑नी॒ द्यावा॑पृथि॒वी अन्ति॑सुम्ने॒ महि॑व्रते । आपः॑ स॒प्त सु॑स्रुवुर्दे॒वीस्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (१)
शोभाकारिणी, द्यावा पृथ्वी के मध्य जो अज्ञानावृत जन चेतन और अचेत की मध्यवर्ती दशा में वर्तमान हैं, वे सात प्रकार के दिव्य जल बरसाते हैं. ऐसे द्यावा पृथ्वी हमें पाप कर्म से बचाएं. (१)
Shobhakarini, Dyava The ignorant people who are present in the intermediate state of consciousness and unconscious in the middle of the earth, they rain seven types of divine water. In such a way, save us from sinful deeds. (1)