हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.52.5

कांड 7 → सूक्त 52 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 52
अजै॑षं त्वा॒ संलि॑खित॒मजै॑षमु॒त सं॒रुध॑म् । अविं॒ वृको॒ यथा॒ मथ॑दे॒वा म॑थ्नामि ते कृ॒तम् ॥ (५)
विरोधी जुआरी को संबोधन कर के कहा जा रहा है—हे जुआरी! तूने अपने पैरों में अंकों को ठीक से लिख लिया है. फिर भी मैं तुझे जीतूंगा. मैं तुझे ऐसे स्थान में जीत लूंगा, जहां अंक रोके जाते हैं. भेड़िया जिस प्रकार भेड़ को मसल डालता है, उसी प्रकार मैं तेरे दांव को नष्ट कर दूंगा. (५)
Addressing the opposing gambler, it is being said- O gambler! You have written the digits properly in your feet. Yet I will win you. I will win you in a place where points are withheld. Just as the wolf rubs the sheep, so I will destroy your bet. (5)