हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.58.4

कांड 7 → सूक्त 58 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 58
अ॒यं यो व॒क्रो विप॑रु॒र्व्यङ्गो॒ मुखा॑नि व॒क्रा वृ॑जि॒ना कृ॒णोषि॑ । तानि॒ त्वं ब्र॑ह्मणस्पत इ॒षीका॑मिव॒ सं न॑मः ॥ (४)
हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि अंग टेट़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी सींक को सरल बनाया जाता है. (४)
O Brahmanaspati! Cut by the snake etc., which shrinks the male organs, the joints of its organs have become loose, its organs have been forced and its mouth etc. organs have been torn. You make all the parts of it straight in the same way as the crooked seam is simplified. (4)