हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 67
प्र॑ती॒चीन॑फलो॒ हि त्वमपा॑मार्ग रु॒रोहि॑थ । सर्वा॒न्मच्छ॒पथाँ॒ अधि॒ वरी॑यो यावया इ॒तः ॥ (१)
हे अपामार्ग अर्थात्‌ चिरचिटा के झाड़! तुम सामने की ओर मुख वाले फलों के रूप में उगे हो, इस कारण मेरे सभी दोषों को मुझ से अत्यधिक दूर करो. (१)
O Apamarga, that is, the tree of Chirchita! You have grown as fruits facing the front, so remove all my defects from me too much. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 67
यद्दु॑ष्कृ॒तं यच्छम॑लं॒ यद्वा॑ चेरिम पा॒पया॑ । त्वया॒ तद्वि॑श्वतोमु॒खापा॑मा॒र्गाप॑ मृज्महे ॥ (२)
हमने जो दुष्कर्म, पाप एवं मलिन आचरण किया है, हे सभी ओर शाखाओं वाले अपामार्ग अर्थात्‌ चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा हम उसे दूर करते हैं. (२)
The misdeeds, sins and defiles we have committed, O branches on all sides, that is, the tree of chirchita! Through you we remove him. (2)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 67
श्या॒वद॑ता कुन॒खिना॑ ब॒ण्डेन॒ यत्स॒हासि॒म । अपा॑मार्ग॒ त्वया॑ व॒यं सर्वं॒ तदप॑ मृज्महे ॥ (३)
हम ने काले दांतों वाले, बुरे नाखूनों वाले एवं नपुंसक पुरुष के साथ भोजन किया है. हे अपामार्ग अर्थात्‌ चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा उस से होने वाले पाप का हम निवारण करते हैं. (३)
We have eaten with a man with black teeth, bad nails and impotent. O Apamarga, that is, the tree of Chirchita! We remove the sin you commit from him. (3)