अथर्ववेद (कांड 7)
यत्किं चा॒सौ मन॑सा॒ यच्च॑ वा॒चा य॒ज्ञैर्जु॒होति॑ ह॒विषा॒ यजु॑षा । तन्मृ॒त्युना॒ निरृ॑तिः संविदा॒ना पु॒रा स॒त्यादाहु॑तिं हन्त्वस्य ॥ (१)
दूर स्थित मेरा शत्रु मेरी हत्या करने की इच्छा से जो कर्म करने का विचार करता है तथा वचन से जो कर्म करने की बात कहता है, अभिचार कर्मो अर्थात् जादूटोने के द्वारा उस के लिए उचित द्रव्य के द्वारा तथा मंत्र के द्वारा जो होम करता है, उस कर्म को सफल होने से पहले ही पाप देवता निर्त्ति मृत्यु के साथ मिल कर नष्ट करें. (१)
My enemy in the distance, who thinks of doing the action he thinks of killing me and the action he says to do with the word, through the right substance and mantra for him by witchcraft, the sin god should destroy that karma together with death before it is successful. (1)