हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.77.10

कांड 7 → सूक्त 77 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 77
अग्ने॒ शर्ध॑ मह॒ते सौभ॑गाय॒ तव॑ द्यु॒म्नान्यु॑त्त॒मानि॑ सन्तु । सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॒मा कृ॑णुष्व शत्रूय॒ताम॒भि ति॑ष्ठा॒ महां॑सि ॥ (१०)
हे अग्नि! तुम हमें धनधान्य देने के लिए कोमल मन वाले बनो. तुम्हारे प्रकाशित होते हुए तेज उत्तम हों. तुम इस प्रकार की कृपा करो, जिस से हम पतिपत्नी दोनों एकमात्र तुम्हारी सेवा करें. जो अपनेआप को हमारा शत्रु मानते हैं, उन के तेजों पर तुम आक्रमण करो. (१०)
O agni! Be gentle-minded to give us wealth. May your brightness be good as you are illuminated. Be kind to you so that we, both husband and wife, may serve you only. Attack the glory of those who consider themselves our enemies. (10)