हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.80.2

कांड 7 → सूक्त 80 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 80
या ग्रैव्या॑ अप॒चितोऽथो॒ या उ॑पप॒क्ष्याः । वि॒जाम्नि॒ या अ॑प॒चितः॑ स्वयं॒स्रसः॑ ॥ (२)
जो गंडमालाएं गले में होती हैं, बगल में होती हैं और गोपनीय स्थानों में होती हैं, वे सब बिना पकी हुई गंडमालाएं पक कर फूट जाएं. (२)
All the gooseberrys that are around the neck, next to them and in confidential places, all those uncooked gooseberrys and burst. (2)