हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.86.6

कांड 7 → सूक्त 86 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
यं दे॒वा अं॒शुमा॑प्या॒यय॑न्ति॒ यमक्षि॑त॒मक्षि॑ता भ॒क्षय॑न्ति । तेना॒स्मानिन्द्रो॒ वरु॑णो॒ बृह॒स्पति॒रा प्या॑ययन्तु॒ भुव॑नस्य गो॒पाः ॥ (६)
जिस सोम को देवगण शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एकएक कला दे कर बढ़ाते हैं तथा जिस सोम को संपूर्ण रूप में सभी दिनों में क्षीणता रहित पितर आदि पीते हैं. उस सोम के साथ इंद्र, वरुण, बृहस्पति एवं सभी प्राणियों के रक्षक देव हवि आदि से प्रसन्न करने वाले हम को बढ़ाएं. (६)
The Som which is increased by the Devas by giving one art every day in the Shukla Paksha and which is completely drunk on all days without attenuation, pitar etc. With that Soma, increase us who please Indra, Varuna, Jupiter and God Havi etc. protector of all beings. (6)