हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
पू॑र्वाप॒रं च॑रतो मा॒ययै॒तौ शिशू॒ क्रीड॑न्तौ॒ परि॑ यातोऽर्ण॒वम् । विश्वा॒न्यो भुव॑ना वि॒चष्ट॑ ऋ॒तूँर॒न्यो वि॒दध॑ज्जायसे॒ नवः॑ ॥ (१)
सूर्य और चंद्र आगेपीछे चलते हुए आकाश में साथसाथ गमन करते हैं. ये शिशु के रूप में सागरों के पास जाते हैं. इन में से एक आदित्य अर्थात्‌ सूर्य समस्त प्राणियों को देखता है तथा दूसरा चंद्रमा ऋतुओं, मासों एवं पक्षों का निर्माण करता हुआ नवीन होता रहता है. (१)
The sun and the moon move backwards together in the sky. They go to the oceans as infants. One of these adityas i.e. sun sees all beings and the other moon keeps getting new, creating seasons, months and sides. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
नवो॑नवो भवसि॒ जाय॑मा॒नोऽह्नां॑ के॒तुरु॒षसा॑मे॒ष्यग्र॑म् । भा॒गं दे॒वेभ्यो॒ वि द॑धास्या॒यन्प्र च॑न्द्रमस्तिरसे दी॒र्घमायुः॑ ॥ (२)
हे चंद्रमा! तू शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आदि तिथियों में उत्पन्न होता हुआ नवीन बनता है. झंडे के समान दिनों का परिचय कराता हुआ तू रात्रियों के आगेआगे चलता है. हे चंद्रमा! इस प्रकार ह्लास और वृद्धि के द्वारा पखवाड़े के अंत को प्राप्त हुआ तू हवि का विभाग करता है. इस प्रकार तू दीर्घ आयु धारण करता है. (२)
O moon! You become new born on the pratipada etc. dates of Shukla Paksha. You walk ahead of the nights, introducing days like a flag. O moon! Thus achieved at the end of the fortnight by halas and growth does the division of Havi. In this way you have a long life. (2)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
सोम॑स्यांशो युधां प॒तेऽनू॑नो॒ नाम॒ वा अ॑सि । अनू॑नं दर्श मा कृधि प्र॒जया॑ च॒ धने॑न च ॥ (३)
हे सोम अर्थात्‌ चंद्रमा के अंश रूप पुत्र अर्थात्‌ बुध एवं योद्धाओं के पालक! तुम सर्वदा तेजस्वी हो, इसलिए हे द्रष्टव्य बुध! हवि के द्वारा तुम्हारी पूजा करने वाले मुझ को पुत्र आदि प्रजा एवं धन से संपन्न बनाओ. (३)
O Soma means the son of the moon, that is, mercury and the guardian of the warriors! You are always brilliant, so O visionary Mercury! Make me, who worship you through Havi, be endowed with sons, people and wealth. (3)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
द॒र्शोसि॑ दर्श॒तोसि॒ सम॑ग्रोऽसि॒ सम॑न्तः । सम॑ग्रः॒ सम॑न्तो भूयासं॒ गोभि॒रश्वैः॑ प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्गृ॒हैर्धने॑न ॥ (४)
हे चंद्र! तुम अमावस्या के साथ ही सूर्य के भी देखने योग्य हो. इस के बाद तृतीया आदि तिथियों में भी तुम कला रूप से दिखाई देते हो. इस के पश्चात अष्टमी आदि तिथियों में इस से भी अधिक स्पष्ट दिखाई देते हो. पौर्णमासी तिथि में तुम संपूर्ण कलाओं से युक्त हो जाते हो. इसी प्रकार मैं भी गाय आदि से समृद्ध और संपूर्ण बनूं. (४)
O moon! You are able to see the sun along with the new moon. After this, you also appear in the art form in the dates of Tritiya etc. After this, you appear more clearly than this in ashtami etc. dates. In the holy date, you become full of all the arts. Similarly, I should also become prosperous and complete with cow etc. (4)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
यो॑३ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तस्य॒ त्वं प्रा॒णेना प्या॑यस्व । आ व॒यं प्या॑सिषीमहि॒ गोभि॒रश्वैः॑ प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्गृ॒हैर्धने॑न ॥ (५)
हे सोम! जो शत्रु हम से द्वेष करता है अथवा जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, तुम उस शत्रु के प्राणों का अपहरण करो. हम गायों, अश्वी, प्रजाओं, पशुओं, धनों और घटों से युक्त (५)
O Mon! The enemy who hates us or the enemy we hate, you kidnap the life of that enemy. We are full of cows, horsemen, subjects, animals, wealth, and sickness.

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 86
यं दे॒वा अं॒शुमा॑प्या॒यय॑न्ति॒ यमक्षि॑त॒मक्षि॑ता भ॒क्षय॑न्ति । तेना॒स्मानिन्द्रो॒ वरु॑णो॒ बृह॒स्पति॒रा प्या॑ययन्तु॒ भुव॑नस्य गो॒पाः ॥ (६)
जिस सोम को देवगण शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एकएक कला दे कर बढ़ाते हैं तथा जिस सोम को संपूर्ण रूप में सभी दिनों में क्षीणता रहित पितर आदि पीते हैं. उस सोम के साथ इंद्र, वरुण, बृहस्पति एवं सभी प्राणियों के रक्षक देव हवि आदि से प्रसन्न करने वाले हम को बढ़ाएं. (६)
The Som which is increased by the Devas by giving one art every day in the Shukla Paksha and which is completely drunk on all days without attenuation, pitar etc. With that Soma, increase us who please Indra, Varuna, Jupiter and God Havi etc. protector of all beings. (6)