हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.89.1

कांड 7 → सूक्त 89 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 89
अ॑नाधृ॒ष्यो जा॒तवे॑दा॒ अम॑र्त्यो वि॒राड॑ग्ने क्षत्र॒भृद्दी॑दिही॒ह । विश्वा॒ अमी॑वाः प्रमु॒ञ्चन्मानु॑षीभिः शि॒वाभि॑र॒द्य परि॑ पाहि नो॒ गय॑म् ॥ (१)
हे अग्नि! कोई तुम्हें तनिक भी पराजित नहीं कर सकता. हे जातवेद! अमर, विराट्‌ और क्षत्र बल को धारण करने वाले वरुण हमारे इस यज्ञ स्थल में अतिशय दीप्त बनें तथा सभी रोगों का विनाश कर के इस समय सभी मनुष्य संबंधी कल्याणों से हमारे घरों की रक्षा करें. (१)
O agni! No one can defeat you at all. O Jataved! Varuna, who wears immortal, vast and kshatra force, should be very bright in this yajna place of ours and destroy all diseases and protect our homes from all human welfare at this time. (1)