हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 94
अ॒पो दि॒व्या अ॑चायिषं॒ रसे॑न॒ सम॑पृक्ष्महि । पय॑स्वानग्न॒ आग॑मं॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥ (१)
मैं दिव्य जलों की पूजा करता हूं. मैं उन जलों के रस से युक्त हो जाऊं. हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हवि ले कर आया हूं. इस प्रकार के मुझे तुम तेज से युक्त करो. (१)
I worship divine waters. I should be equipped with the juice of those waters. O agni! I have brought you havi for you. Thus let me contain you sharp. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 94
सं मा॑ग्ने॒ वर्च॑सा सृज॒ सं प्र॒जया॒ समायु॑षा । वि॒द्युर्मे॑ अ॒स्य दे॒वा इन्द्रो॑ विद्यात्स॒ह ऋषि॑भिः ॥ (२)
हे अग्नि! मुझे तेज से, बल से, संतान से एवं लंबी आयु से युक्त करो. मेरी पवित्रता को देवगण जाने तथा अतींद्रिय मुनियों के साथ इंद्र भी मेरी पवित्रता को जाने. (२)
O agni! Equip me with speed, strength, children and long life. Devgana knows my purity and Indra along with the supernatural munis also knows my purity. (2)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 94
इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हताव॒द्यं च॒ मलं॑ च॒ यत् । यच्चा॑भिदु॒द्रोहानृ॑तं॒ यच्च॑ शे॒पे अ॒भीरु॑णम् ॥ (३)
हे जलो! मेरे इस पाप को दूर करो. मुझ में जो निंदा रूपी मल तथा असत्य है, उस से देवगण द्रोह करें. अर्थात्‌ उसे समाप्त कर दें. मैं ने ऋण ले कर उसे न चुकाने के लिए जो शपथ खाई है, उस पाप को भी देवगण मुझ से दूर करें. (३)
O burn! Remove this sin of mine. Deities should slander with the filth and untruth of condemnation in me. That is, eliminate it. May the gods also remove from me the sin that I have taken an oath not to repay it by taking a loan. (3)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 94
एधो॑ऽस्येधिषी॒य स॒मिद॑सि॒ समे॑धिषीय । तेजो॑ऽसि॒ तेजो॒ मयि॑ धेहि ॥ (४)
हे अग्नि! तुम दीप्त होते हो, इस के फल के रूप में मैं समृद्ध बनूं. हे अग्नि! तुम तेज रूप हो, इसीलिए मुझ में भी तेज धारण करो. (४)
O agni! You are bright, as a fruit of this, may I become prosperous. O agni! You are a sharp form, that is why wear fast in me too. (4)