हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.124.6

मंडल 1 → सूक्त 124 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 124
ए॒वेदे॒षा पु॑रु॒तमा॑ दृ॒शे कं नाजा॑मिं॒ न परि॑ वृणक्ति जा॒मिम् । अ॒रे॒पसा॑ त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दाना॒ नार्भा॒दीष॑ते॒ न म॒हो वि॑भा॒ती ॥ (६)
इस प्रकार विस्तार को प्राप्त हुई उषा अपने जाति वाले देवों और विजातीय मानवों सभी को प्राप्त होती है, जिससे वे सुखपूर्वक देख सकें. अपने निर्मल शरीर के कारण स्पष्ट होती हुई उषा छोटे बड़े किसी के पास से नहीं हटती. (६)
In this way, the expansion is achieved by all the gods and the heterogeneous human beings of their jati, so that they can see happily. Because of her pure body, Usha does not move away from anyone small and big. (6)