ऋग्वेद (मंडल 1)
यत्र॒ ग्रावा॑ पृ॒थुबु॑ध्न ऊ॒र्ध्वो भव॑ति॒ सोत॑वे । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥ (१)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए भारी जड़ वाला पत्थर उठाया जाता है और ओखली की सहायता से सोमरस तैयार किया जाता है, वहां सोमरस अपना जानकर पिओ. (१)
O Indra! In the yajna in which a heavy root stone is picked up to squeeze the somras and the somras is prepared with the help of okhali, drink the somras knowing your own. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यत्र॒ द्वावि॑व ज॒घना॑धिषव॒ण्या॑ कृ॒ता । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥ (२)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता को निचोड़ने के लिए दोनों फलक जांघों के समान फैल गए हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (२)
O Indra! In the yajna in which both the blades have spread out like the thighs to squeeze somlata, in the same yajna drink the somras prepared by Okhali knowing your own knowledge. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यत्र॒ नार्य॑पच्य॒वमु॑पच्य॒वं च॒ शिक्ष॑ते । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥ (३)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में यजमान की पत्नियां भीतर घुसती और बाहर निकलती रहती हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (३)
O Indra! In the yajna in which the wives of the host enter and go out, drink the somras prepared by Okhali in the same yajna knowing your own knowledge. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यत्र॒ मन्थां॑ विब॒ध्नते॑ र॒श्मीन्यमि॑त॒वा इ॑व । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥ (४)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता मंथन करने का दंड घोड़े की लगाम के समान बांधा जाता है, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (४)
O Indra! In the yajna in which the punishment for churning the somlata is tied like the reins of the horse, in the same yajna, drink the somras prepared by Okhali knowing yourself. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यच्चि॒द्धि त्वं गृ॒हेगृ॑ह॒ उलू॑खलक यु॒ज्यसे॑ । इ॒ह द्यु॒मत्त॑मं वद॒ जय॑तामिव दुन्दु॒भिः ॥ (५)
हे ऊखल! यद्यपि घर-घर में तुम्हारा प्रयोग किया जाता है, पर इस यज्ञ में तुम उसी प्रकार ध्वनि करते हो, जिस प्रकार विजयी लोग दुंदुभी बजाते हैं. (५)
Oh, o you! Although you are used from house to house, in this yajna you make the same sound as the victorious people play the dundubhi. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒त स्म॑ ते वनस्पते॒ वातो॒ वि वा॒त्यग्र॒मित् । अथो॒ इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒नु सोम॑मुलूखल ॥ (६)
हे ऊखल रूप काष्ट! तुम्हारे ही सामने होकर हवा चलती है, इसलिए हे ऊखल! इंद्र देवता के पान के लिए सोमरस तैयार करो. (६)
O o fuming form! The wind blows in front of you, so O Ukha! Prepare somras for the paan of Indra Devta. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
आ॒य॒जी वा॑ज॒सात॑मा॒ ता ह्यु१॒॑च्चा वि॑जर्भृ॒तः । हरी॑ इ॒वान्धां॑सि॒ बप्स॑ता ॥ (७)
हे ऊखल और मूसल! तुम दोनों सभी प्रकार यज्ञ के साधन एवं प्रभूत अन्न देने वाले हो. जिस प्रकार इंद्र के दोनों घोड़े अपना खाद्य चना आदि चबाते समय ध्वनि करते हैं, उसी प्रकार तुम भी तुमुल ध्वनि के साथ परस्पर प्रहार करते हो. (७)
O ukhaal and musal! Both of you are the ones who give all kinds of means of yajna and the great food. Just as both of Indra's horses make a sound while chewing their food chana, etc., in the same way you also strike each other with a tul sound. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ता नो॑ अ॒द्य व॑नस्पती ऋ॒ष्वावृ॒ष्वेभिः॑ सो॒तृभिः॑ । इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्सुतम् ॥ (८)
हे ऊखल और मूसल रूप दोनों काष्ठो! तुम दोनों देखने में परम सुंदर हो. शोभन अभिनव मंत्रों के सहयोग से तुम दोनों इंद्र के लिए मधुर सोमरस तैयार करो. (८)
O wood, both in the form of a ukhaal and a muslin! You're both the ultimate beautiful in appearance. Shobhan in collaboration with innovative mantras prepare the sweet somras for both of you Indra. (8)