हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.51.5

मंडल 1 → सूक्त 51 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
त्वं मा॒याभि॒रप॑ मा॒यिनो॑ऽधमः स्व॒धाभि॒र्ये अधि॒ शुप्ता॒वजु॑ह्वत । त्वं पिप्रो॑र्नृमणः॒ प्रारु॑जः॒ पुरः॒ प्र ऋ॒जिश्वा॑नं दस्यु॒हत्ये॑ष्वाविथ ॥ (५)
हे इंद्र! जो असुर हविष्य अन्नों से सुशोभित अपने मुखों में ही यज्ञीय सामग्री डाल लेते थे, तुमने उन मायावियों को माया द्वारा पराजित किया था. हे यजमानों पर अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! तुमने पिप्रु असुर के निवासस्थान ध्वस्त कर दिए थे. तुमने हत्या करने के लिए उद्यत दस्युओं के हाथों में पड़े ऋजिश्चान्‌ की पूर्णतया रक्षा की थी. (५)
O Indra! The asuras who used to put sacrificial material in their mouths adorned with the food grains, you defeated those Mayavis by maya. O Indra, who has mercy on hosts! You demolished the abodes of Pipru Asura. You fully protected the ristian in the hands of the bandits to kill. (5)