हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 156
अ॒ग्निं हि॑न्वन्तु नो॒ धियः॒ सप्ति॑मा॒शुमि॑वा॒जिषु॑ । तेन॑ जेष्म॒ धनं॑धनम् ॥ (१)
जिस प्रकार युद्धों में घोड़ों को दौड़ाया जाता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां अग्नि को प्रेरित करें. अग्नि की कृपा से हम सब धनों को जीतें. (१)
Just as horses are run in wars, so so may our praises inspire agni. By the grace of agni, let us conquer all the riches. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 156
यया॒ गा आ॒करा॑महे॒ सेन॑याग्ने॒ तवो॒त्या । तां नो॑ हिन्व म॒घत्त॑ये ॥ (२)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित जिस सेना की सहायता से हमने गाएं प्राप्त कीं, हमें धनप्राप्ति के लिए वे ही रक्षासाधन दो. (२)
O agni! The army you protected with the help of which we received the cows, give us the same defense money to get the money. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 156
आग्ने॑ स्थू॒रं र॒यिं भ॑र पृ॒थुं गोम॑न्तम॒श्विन॑म् । अ॒ङ्धि खं व॒र्तया॑ प॒णिम् ॥ (३)
हे अग्नि! हमें गायों और अश्वों के साथ बहुत सा धन दो. तुम जल से आकाश को सींचो और व्यापारी को व्यापार में लगाओ. (३)
O agni! Give us lots of money with cows and horses. You irrigate the sky with water and put the merchant into business. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 156
अग्ने॒ नक्ष॑त्रम॒जर॒मा सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि । दध॒ज्ज्योति॒र्जने॑भ्यः ॥ (४)
हे अग्नि! तुम सदा चलने वाले जरारहित तथा लोगों को प्रकाश देने वाले सूर्य को आकाश में स्थित करो. (४)
O agni! "You place in the sky the sun, which is always moving, unharmed and which gives light to the people. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 156
अग्ने॑ के॒तुर्वि॒शाम॑सि॒ प्रेष्ठः॒ श्रेष्ठ॑ उपस्थ॒सत् । बोधा॑ स्तो॒त्रे वयो॒ दध॑त् ॥ (५)
हे अग्नि! तुम प्रजाओं का ज्ञान कराने वाले, अतिशय प्रिय एवं श्रेष्ठ हो. तुम यज्ञशाला में बैठो, स्तुतियां और अन्न धारण करो. (५)
O agni! You are the ones who give knowledge of the people, the most beloved and the best. Sit in the yajnashala, hold on to the praises and the food. (5)