हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
को वे॑द॒ जान॑मेषां॒ को वा॑ पु॒रा सु॒म्नेष्वा॑स म॒रुता॑म् । यद्यु॑यु॒ज्रे कि॑ला॒स्यः॑ ॥ (१)
इन मरुतों का जन्म कौन जानता है? मरुतों का सुख सर्वप्रथम किसने अनुभव किया? जब इन्होंने रथ में पृश्नि को जोड़ा था, तब इनकी शक्ति किसने जानी? (१)
Who knows the birth of these maruts? Who first experienced the happiness of the maruts? When they added the earth to the chariot, who knew their power? (1)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
ऐतान्रथे॑षु त॒स्थुषः॒ कः शु॑श्राव क॒था य॑युः । कस्मै॑ सस्रुः सु॒दासे॒ अन्वा॒पय॒ इळा॑भिर्वृ॒ष्टयः॑ स॒ह ॥ (२)
मरुतों को रथ पर बैठा हुआ किसने सुना था? इनके गमन का ढंग कौन जानता है? बंधुरूप एवं वर्षाकारक मरुद्गण अन्न लेकर किस दानशील के लिए अवतीर्ण होते हैं? (२)
Who had heard the maruts sitting on the chariot? Who knows how they move? The brothers and rain-fed deserts descend to which charity with food? (2)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
ते म॑ आहु॒र्य आ॑य॒युरुप॒ द्युभि॒र्विभि॒र्मदे॑ । नरो॒ मर्या॑ अरे॒पस॑ इ॒मान्पश्य॒न्निति॑ ष्टुहि ॥ (३)
तेजस्वी घोड़ों पर सवार होकर जो मरुद्गण सोमरस का आनंद प्राप्त करने आए थे, उन्होंने मुझसे कहा कि वे नेता, मानव हितकारी एवं आसक्तिरहित हैं. हे ऋषि! इस प्रकार के मरुतों को देखकर उनकी स्तुति करो. (३)
The deserters who had come on stunning horses to enjoy the Somras told me that they were leaders, human-benefactors and without attachment. O sage! Seeing these kinds of maruts, praise them. (3)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
ये अ॒ञ्जिषु॒ ये वाशी॑षु॒ स्वभा॑नवः स्र॒क्षु रु॒क्मेषु॑ खा॒दिषु॑ । श्रा॒या रथे॑षु॒ धन्व॑सु ॥ (४)
हे मरुतो! तुम्हारे आभरणों, आयुधों, मालाओं, सीने पर पहने जाने वाले गहनों, हाथ- पैरों एवं उन में पहने जाने वाले कंकणों, रथों एवं धनुषों में जो बल आश्रित है, उसकी हम स्तुति करते हैं. (४)
O Maruto! We praise the strength that is dependent on your fillers, weapons, garlands, chest ornaments, hands and feet, and the thorns, chariots and bows that are worn in them. (4)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
यु॒ष्माकं॑ स्मा॒ रथा॒ँ अनु॑ मु॒दे द॑धे मरुतो जीरदानवः । वृ॒ष्टी द्यावो॑ य॒तीरि॑व ॥ (५)
हे शीघ्र दान करने वाले मरुतो! वर्षा के निमित्त सभी जगह जाने वाली दीप्ति के समान तुम्हारे रथ को देखकर हम प्रमुदित होते हैं. (५)
O you who give soon, Maruto! We are delighted to see your chariot like a radiant going everywhere for the rain. (5)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
आ यं नरः॑ सु॒दान॑वो ददा॒शुषे॑ दि॒वः कोश॒मचु॑च्यवुः । वि प॒र्जन्यं॑ सृजन्ति॒ रोद॑सी॒ अनु॒ धन्व॑ना यन्ति वृ॒ष्टयः॑ ॥ (६)
नेता एवं शोभन दान वाले मरुद्गण हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए आकाश से बादल को बरसाते हैं. वे धरती एवं आकाश के कल्याण के लिए बादल को छोड़ते हैं. वर्षा करने वाले मरुत्‌ सभी जगह जाने वाले जल के साथ गमन करते हैं. (६)
The leaders and the deserts of shobhan daan rain the clouds from the sky for the welfare of the host who gives the havi. They leave the cloud for the welfare of the earth and the sky. Rainy deserts travel with water that goes all over the place. (6)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
त॒तृ॒दा॒नाः सिन्ध॑वः॒ क्षोद॑सा॒ रजः॒ प्र स॑स्रुर्धे॒नवो॑ यथा । स्य॒न्ना अश्वा॑ इ॒वाध्व॑नो वि॒मोच॑ने॒ वि यद्वर्त॑न्त ए॒न्यः॑ ॥ (७)
भेदन किए गए बादल से निकली हुई जल-धाराएं वेग के साथ आकाश में इस प्रकार गमन करती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय दूध देती है. शीघ्रगामी अश्व जिस प्रकार मार्गो पर चलते हैं, उसी प्रकार नदियां तेजी से बहती हैं. (७)
The streams of water coming out of the penetrated cloud move into the sky with velocity in the same way that the milch cow gives milk. Just as the fast-moving horses walk on the routes, so the rivers flow fast. (7)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
आ या॑त मरुतो दि॒व आन्तरि॑क्षाद॒मादु॒त । माव॑ स्थात परा॒वतः॑ ॥ (८)
हे मरुतो! तुम अंतरिक्ष, स्वर्ग अथवा इहलोक से यहां आओ. तुम दूरवर्ती स्थान में मत रहो. (८)
O Maruto! You come here from space, heaven or ihlok. Don't stay in a remote place. (8)
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