ऋग्वेद (मंडल 5)
कूष्ठो॑ देवावश्विना॒द्या दि॒वो म॑नावसू । तच्छ्र॑वथो वृषण्वसू॒ अत्रि॑र्वा॒मा वि॑वासति ॥ (१)
हे स्तुतिरूपी धन के स्वामी एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! आज तुम धरती पर स्थित होकर उस स्तुति समूह को सुनो, जिसके द्वारा अत्रि तुम्हारी सेवा करते हैं. (१)
O lord of the glory and the workman Ashwinikumaro! Today you are on earth and listen to the praise group by which Atri serves you. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
कुह॒ त्या कुह॒ नु श्रु॒ता दि॒वि दे॒वा नास॑त्या । कस्मि॒न्ना य॑तथो॒ जने॒ को वां॑ न॒दीनां॒ सचा॑ ॥ (२)
वे देव अश्विनीकुमार आज कहां हैं? आज वे स्वर्ग में कहां निवास कर रहे हैं? तुम किस यजमान के पास आते हो? कीन तुम्हारी स्तुतियों का सहायक होगा? (२)
Where is that God Ashwinikumar today? Where are they living in heaven today? Which host do you come to? Who will be the helper of your praises? (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
कं या॑थः॒ कं ह॑ गच्छथः॒ कमच्छा॑ युञ्जाथे॒ रथ॑म् । कस्य॒ ब्रह्मा॑णि रण्यथो व॒यं वा॑मुश्मसी॒ष्टये॑ ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम किस यजमान के प्रति गमन करते हो, किसके पास पहुंचते हो एवं किसके सामने जाने के लिए रथ में घोड़े जोड़े हो? तुम किसकी स्तुतियों से प्रसन्न होते हो? हम तुम्हें पाने की इच्छा करते हैं. (३)
O Ashwinikumaro! To which host do you travel, to whom do you approach, and in front of whom do you have horses added to the chariot to go? Whose praises are you pleased with? We wish to get you. (3)
ऋग्वेद (मंडल 5)
पौ॒रं चि॒द्ध्यु॑द॒प्रुतं॒ पौर॑ पौ॒राय॒ जिन्व॑थः । यदीं॑ गृभी॒तता॑तये सिं॒हमि॑व द्रु॒हस्प॒दे ॥ (४)
हे पौर द्वारा स्तुत अश्विनीकुमारो! तुम जल बरसाने वाले बादल को पौर ऋषि के पास भेजो. शूर जिस प्रकार गरजते हुए सिंह को मार गिराता है, उसी प्रकार यज्ञकार्य में व्यस्त पौर के निकट तुम बादल को बरसाओ. (४)
O Pour, praised by Ashwinikumaro! You send the raining cloud to the sage Pour. Just as the knight kills the thundering lion, so do you rain the cloud near the paur busy in the yagna work. (4)
ऋग्वेद (मंडल 5)
प्र च्यवा॑नाज्जुजु॒रुषो॑ व॒व्रिमत्कं॒ न मु॑ञ्चथः । युवा॒ यदी॑ कृ॒थः पुन॒रा काम॑मृण्वे व॒ध्वः॑ ॥ (५)
तुमने जराजीर्ण च्यवन ऋषि के शरीर से त्याज्य बुढ़ापे को इस प्रकार अलग कर दिया था, जिस प्रकार योद्धा अपना कवच उतार देता है. जब तुमने उन्हें दुबारा युवा बनाया तो उन्होंने वधू द्वारा चाहने योग्य रूप पाया. (५)
You separated the old age from the body of the sage Jarajeerna Chyavan in such a way that the warrior takes off his armor. When you made them young again, they found the form desired by the bride. (5)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अस्ति॒ हि वा॑मि॒ह स्तो॒ता स्मसि॑ वां सं॒दृशि॑ श्रि॒ये । नू श्रु॒तं म॒ आ ग॑त॒मवो॑भिर्वाजिनीवसू ॥ (६)
हे देव अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे स्तोता तुम्हारे सामने रहें. हे अन्नयुक्त देवो! तुम हमारी पुकार सुनकर रक्षासाधनों सहित आओ. (६)
Oh God Ashwinikumaro! Let's be your stocha in front of you. O god of food! You hear our call and come with the means of defense. (6)
ऋग्वेद (मंडल 5)
को वा॑म॒द्य पु॑रू॒णामा व॑व्ने॒ मर्त्या॑नाम् । को विप्रो॑ विप्रवाहसा॒ को य॒ज्ञैर्वा॑जिनीवसू ॥ (७)
हे अन्नस्वामी अश्विनीकुमारो! आज कीन मनुष्य तुम्हारी सबसे अधिक सेवा करता है? हेज्ञानियों द्वारा शिरोधार्य! तुम्हें यज्ञों द्वारा कौन प्रसन्न करता है. (७)
O Annaswamy Ashwinikumaro! What man serves you the most today? Heady by the wise! Who pleases you by the sacrifices? (7)
ऋग्वेद (मंडल 5)
आ वां॒ रथो॒ रथा॑नां॒ येष्ठो॑ यात्वश्विना । पु॒रू चि॑दस्म॒युस्ति॒र आ॑ङ्गू॒षो मर्त्ये॒ष्वा ॥ (८)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम्हारा रथ इस स्थान पर आवे. वह अन्य देवों के रथों से तेज चलने वाला, हमारी हितकामना करने वाला, हमारे विरोधियों का तिरस्कार करने वाला एवं सभी यजमानों में स्तुति का विषय है. (८)
O aschinikumaro! Let your chariot come to this place. He is faster than the chariots of other gods, who begs our interests, despises our opponents, and is a matter of praise among all hosts. (8)