हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
यदि॑न्द्र॒ प्रागपा॒गुद॒ङ्न्य॑ग्वा हू॒यसे॒ नृभिः॑ । आ या॑हि॒ तूय॑मा॒शुभिः॑ ॥ (१)
हे इंद्र! तुम हमारे अध्वर्युजनों द्वारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं नीचे की दिशा में बुलाए जाते हो. तुम अपने घोड़ों की सहायता से जल्दी आओ. (१)
O Indra! You are called by our followers in the east, west, north and down direction. You come quickly with the help of your horses. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
यद्वा॑ प्र॒स्रव॑णे दि॒वो मा॒दया॑से॒ स्व॑र्णरे । यद्वा॑ समु॒द्रे अन्ध॑सः ॥ (२)
हे इंद्र! तुम स्वर्गलोक के अमृत टपकाने वाले स्थान पर स्वर्ग प्राप्त कराने वाले, धरती के यज्ञस्थल अथवा अन्न देने वाले अंतरिक्ष में प्रसन्न होते हो. (२)
O Indra! You rejoice in the place of the nectar dripping place of paradise, the sacrificial place of the earth, or in the space that gives food. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
आ त्वा॑ गी॒र्भिर्म॒हामु॒रुं हु॒वे गामि॑व॒ भोज॑से । इन्द्र॒ सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥ (३)
हे महान्‌ एवं विशाल इंद्र! मैं तुम्हें सोमरस पीने के लिए उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस प्रकार गाय को घास खाने के लिए बुलाया जाता है. (३)
O great and great Indra! I call you to drink somras in the same way that the cow is called to eat grass. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
आ त॑ इन्द्र महि॒मानं॒ हर॑यो देव ते॒ महः॑ । रथे॑ वहन्तु॒ बिभ्र॑तः ॥ (४)
हे इंद्र! रथ में जुड़े हुए घोड़े तुम्हारे महत्त्व को तेज करके भली प्रकार वहन करें. (४)
O Indra! May the horses attached in the chariot accelerate your importance and bear it well. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
इन्द्र॑ गृणी॒ष उ॑ स्तु॒षे म॒हाँ उ॒ग्र ई॑शान॒कृत् । एहि॑ नः सु॒तं पिब॑ ॥ (५)
हे महान्‌, उग्र एवं ऐश्वर्यकारी इंद्र! लोगों द्वारा तुमसे याचना की जाती है एवं तुम्हारी स्तुति की जाती है. आकर हमारा सोमरस पिओ. (५)
O great, fierce and glorious Indra! People beg of you and you are praised. Come and drink our somras. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
सु॒ताव॑न्तस्त्वा व॒यं प्रय॑स्वन्तो हवामहे । इ॒दं नो॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑ ॥ (६)
हे इंद्र हम सोमरस निचोड़कर एवं चरु पुरोडाश आदि लेकर अपने इन कुशों पर बैठने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (६)
O Indra, we call you to sit on these kushas of ours by squeezing the somras and taking the charu purodash, etc. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम् । तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे ॥ (७)
हे इंद्र! तुम बहुत से यजमानों के प्रति समान व्यवहार करने वाले हो. इसलिए हम तुम्हें बुलाते हैं. (७)
O Indra! You are going to behave the same way towards many hosts. That's why we call you. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
इ॒दं ते॑ सो॒म्यं मध्वधु॑क्ष॒न्नद्रि॑भि॒र्नरः॑ । जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ तत्पि॑ब ॥ (८)
हे इंद्र! हमारे अध्वर्युगण पत्थरों की सहायता से तुम्हारे लिए मधुर सोमरस निचोड़ते हैं. तुम प्रसन्न होकर उसे पिओ. (८)
O Indra! Our teachers squeeze the sweet somras for you with the help of stones. Drink it with delight. (8)
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