हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.65.1

मंडल 9 → सूक्त 65 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 65
हि॒न्वन्ति॒ सूर॒मुस्र॑यः॒ स्वसा॑रो जा॒मय॒स्पति॑म् । म॒हामिन्दुं॑ मही॒युवः॑ ॥ (१)
हे सोम! कार्यकुशल एवं परस्पर मित्रता रखने वाली मेरी उंगलियां रूपी स्त्रियां तुम्हारा रस निचोड़ने की अभिलाषा से तुम्हारे क्षरण को प्रेरित करती हैं. तुम शोभन-वीर्य वाले, सबके पालनकर्ता, महान्‌ एवं दीप्तिशाली हो. (१)
Hey Mon! Women like my fingers, who are efficient and friendly, inspire your erosion by the desire to squeeze your juice. You are a man of adornment, a man of adornment, a nurturer of all, a great and a radiant. (1)