हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 17.44

अध्याय 17 → मंत्र 44 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि। अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम् ॥ (४४)
व्याधियां हमारे शत्रुओं के चित्त को लुभाएं. उन के अंगों को ग्रहण करें. निर्दयता से शत्रुओं के चित्र को चबाएं. उन के हृदय में शोक व्यापे. शोक से शत्रु गहन अंधकार में डूब जाएं. (४४)
Diseases should attract the minds of our enemies. Take their organs. Chew the picture of enemies mercilessly. Mourning in their hearts. With grief, the enemies should be immersed in deep darkness. (44)