यजुर्वेद (अध्याय 17)
स्व॒र्यन्तो॒ नापे॑क्षन्त॒ऽआ द्या रो॑हन्ति॒ रोद॑सी। य॒ज्ञं ये वि॒श्वतो॑धार॒ꣳ सुवि॑द्वासो वितेनि॒रे ॥ (६८)
जो सुखदायी स्वर्ग के सुख भोगते हैं, वे सांसारिक भोगों की अपेक्षा नहीं करते. वे यज्ञ के धारक वे श्रेष्ठ विद्वान् हैं. वे अपना उज्ज्वल यश फैलाते हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक से ऊपर आरोहण करते हैं. (६८)
Those who enjoy the pleasures of happy heaven do not expect worldly enjoyments. He is the best scholar in the holder of yajna. They spread their bright glory. They ascend above heaven and earth. (68)