यजुर्वेद (अध्याय 30)
ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णं क्ष॒त्राय॑ राज॒न्यं म॒रुद्भ्यो॒ वैश्यं॒ तप॑से॒ शू॒द्रं तम॑से॒ तस्क॑रं नार॒काय॑ वीर॒हणं॑ पा॒प्मने॑ क्ली॒बमा॑क्र॒याया॑ऽअयो॒गूं कामा॑य पुँश्च॒लूमति॑क्रुष्टाय माग॒धम् ॥ (५)
ब्राह्मण के लिए ब्रहाज्ञान, क्षत्रिय के लिए रक्षण, वैश्य के लिए पालनपोषण, शुद्र के लिए सेवा कतंव्य व उपयुक्त हैं. चोर के लिए अंधकार, नरक के लिए वीरघातक, नपुंसक के लिए पाप, खरीद के लिए पुरुषार्थी, काम के लिए व्यभिचारी अच्छी बोलने की शक्ति के लिए प्रमाण देने वाला उपयुक्त होता है. (५)
Brahmagyan for Brahmins, Rakshan for Kshatriyas, Rearing for Vaishya, Service for Shudras are justified and appropriate. Darkness for thief, heroic for hell, sin for impotent, purusharthi for purchase, adulterer for work are suitable for proof of good speech power. (5)