यजुर्वेद (अध्याय 8)
अव॑भृथ निचुम्पुण निचे॒रुर॑सि निचुम्पु॒णः। अव॑ दे॒वैर्दे॒वकृ॑त॒मेनो॑ऽयासिष॒मव॒ मर्त्यै॒र्मर्त्य॑कृतं पु॒रु॒राव्णो॑ देव रि॒षस्पा॑हि। दे॒वाना॑ स॒मिद॑सि ॥ (२७)
हे अवभृथ (स्नान यज्ञ)! आप निचुड़ने व निरंतर बहने वाले हैं. आप दैवकृपा से देवों के प्रति हमारे पाप दूर करने की कृपा कीजिए. आप मनुष्यों के प्रति किए गए हमारे पापों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप परेशान करने बाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से देवत्व बढ़ता है. (२७)
O Aabhrutha (bath yagna)! You are going to go out and flow continuously. Please remove our sins towards the gods by divine grace. Please remove our sins committed to human beings. Please remove your troubled enemies. By your grace, divinity increases. (27)