अथर्ववेद (कांड 11)
अपा॑नति॒ प्राण॑ति॒ पुरु॑षो॒ गर्भे॑ अन्त॒रा । य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॒स्यथ॒ स जा॑यते॒ पुनः॑ ॥ (१४)
पुरुष स्त्री के गर्भाशय के मध्य सांस लेता और अपान वायु छोड़ता है. हे प्राण! जब तुम गर्भस्थ श्रूण को पुष्ट करते हो, तब वह जन्म लेता है. (१४)
The man breathes between the woman's uterus and releases his own air. O soul! When you strengthen the womb, it is born. (14)