हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.6.20

कांड 11 → सूक्त 6 → मंत्र 20 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
अ॒न्तर्गर्भ॑श्चरति दे॒वता॒स्वाभू॑तो भू॒तः स उ॑ जायते॒ पुनः॑ । स भू॒तो भव्यं॑ भवि॒ष्यत्पि॒ता पु॒त्रं प्र वि॑वेशा॒ शची॑भिः ॥ (२०)
प्राण गर्भ हो कर देवताओं में विचरण करता है, वही भलीभांति व्याप्त हो कर मनुष्य आदि के शरीर के रूप में पुनः उत्पन्न होता है. नित्य वर्तमान वह प्राण भूतकाल की वस्तुओं में तथा भविष्य काल की वस्तुओं के रूप में उत्पन्न होता है. वही अपनी शक्तियों से पिता और पुत्र में प्रवेश करता है. (२०)
Prana becomes pregnant and circulates in the gods, the same is well pervaded and regenerated as the body of human beings etc. The present life is produced in the form of things of the past and in the form of objects of the future. He enters the father and son with his powers. (20)