अथर्ववेद (कांड 12)
अ॑यज्ञि॒यो ह॒तव॑र्चा भवति॒ नैने॑न ह॒विरत्त॑वे । छि॒नत्ति॑ कृ॒ष्या गोर्धना॒द्यं क्र॒व्याद॑नु॒वर्त॑ते ॥ (३७)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह यज्ञ करने का अधिकारी नहीं रहता. उस का तेज नष्ट हो जाता है तथा आहूत अर्थात् बुलाए गए देवता उस के पास नहीं आते. (३७)
The man who does not leave the agni of Kravyad is not entitled to perform yajna. His glory is destroyed and the called gods do not come to him. (37)