अथर्ववेद (कांड 12)
मुहु॒र्गृध्यैः॒ प्र व॑द॒त्यार्तिं॒ मर्त्यो॒ नीत्य॑ । क्र॒व्याद्यान॒ग्निर॑न्ति॒काद॑नुवि॒द्वान्वि॒ताव॑ति ॥ (३८)
क्रव्याद अग्नि जिस के पास रह कर ताप देता है, वह पुरुष अत्यंत व्यथा को प्राप्त होता है. आवश्यक वस्तुओं के समेत उसे बारबार दीन वचन कहने पड़ते हैं. (३८)
The man with whom the agni of Kravyad stays and gives heat, that man gets a lot of agony. Along with essential commodities, he has to repeatedly say humble promises. (38)