हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.39

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 39 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
ग्राह्या॑ गृ॒हाः सं सृ॑ज्यन्ते स्त्रि॒या यन्म्रि॒यते॒ पतिः॑ । ब्र॒ह्मैव वि॒द्वाने॒ष्यो॒ यः क्र॒व्यादं॑ निरा॒दध॑त् ॥ (३९)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को पूर्ण रूप से ग्रहण करता है, उस के लिए घर कारागार के समान बन जाता है और स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त होता है. उसे विद्वान्‌ मनुष्य का आदेश मानना चाहिए. (३९)
For the man who fully accepts the agni of kravyad, the house becomes like a prison and the woman's husband attains death. He should obey the command of a learned man. (39)