अथर्ववेद (कांड 12)
इ॒ममिन्द्रं॒ वह्निं॒ पप्रि॑म॒न्वार॑भध्वं॒ स वो॒ निर्व॑क्षद्दुरि॒ताद॑व॒द्यात् । तेनाप॑ हत॒ शरु॑मा॒पत॑न्तं॒ तेन॑ रु॒द्रस्य॒ परि॑ पाता॒स्ताम् ॥ (४७)
इन ऐश्वर्य वाली अग्नि का स्तवन करो. ये तुम्हें पाप से मुक्त करें. उन के द्वारा तुम रुद्र के बाण को दूर हटाते हुए अपनी रक्षा करो. (४७)
Praise these opulence agnis. May it free you from sin. Through them, you protect yourself by removing Rudra's arrow away. (47)