हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.52

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 52 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
प्रेव॑ पिपतिषति॒ मन॑सा॒ मुहु॒रा व॑र्तते॒ पुनः॑ । क्र॒व्याद्यान॒ग्निर॑न्ति॒काद॑नुवि॒द्वान्वि॒ताव॑ति ॥ (५२)
जिस पुरुष के पास आ कर क्रव्याद अग्नि तपती है, वह बारबार आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है तथा अधोगति को प्राप्त होता है. (५२)
The man who comes to whom the agni heats up, he is repeatedly lying in the cycle of movement and attains degradation. (52)