हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
गोभि॑ष्ट्वा पात्वृष॒भो वृषा॑ त्वा पातु वा॒जिभिः॑ । वा॒युष्ट्वा॒ ब्रह्म॑णा पा॒त्विन्द्र॑स्त्वा पात्विन्द्रि॒यैः ॥ (१)
हे विवृत नाम की मणि धारण करने वाले पुरुष! सांड़ गायों के साथ तुम्हारी रक्षा करे तथा प्रजनन करने में समर्थ अश्व घोड़ों के साथ तुम्हारी रक्षा करे. अंतरिक्ष में विचरण करने वाले वायु देवता यज्ञलक्षण वाले कर्म के द्वारा तुम्हारी रक्षा करें. इंद्र देवता इंद्रियों के साथ तुम्हारी रक्षा करें. (१)
O man who wears a gem of the open name! May the bull protect you with cows and the horses capable of breeding protect you with horses. Protect you through the action of the vayu devta yajna nakshatra, who roams in space. May Indra devta protect you with the senses. (1)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
सोम॑स्त्वा पा॒त्वोष॑धीभि॒र्नक्ष॑त्रैः पातु॒ सूर्यः॑ । मा॒द्भ्यस्त्वा॑ च॒न्द्रो वृ॑त्र॒हा वातः॑ प्रा॒णेन॑ रक्षतु ॥ (२)
ओषधियों अर्थात्‌ जड़ीबूटियों के राजा सोम ओषधियों की सहायता से तुम्हारी रक्षा करें. सूर्य देव नक्षत्रों की सहायता से तुम्हारी रक्षा करें. महीनों की सहायता से चंद्रमा, वृत्र अर्थात्‌ आवरण करने वाले अंधकार का नाश करने वाले इंद्र एवं प्राण वायु की सहायता से वायु देव तुम्हारी रक्षा करें. (२)
May Soma, the king of herbs, protect you with the help of medicines. Protect you with the help of Sun God constellations. With the help of months, the moon, the tree, that is, Indra, who destroys the darkness covering, and with the help of prana vayu, may the air god protect you. (2)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
ति॒स्रो दिव॑स्ति॒स्रः पृ॑थि॒वीस्त्रीण्य॒न्तरि॑क्षाणि च॒तुरः॑ समु॒द्रान् । त्रि॒वृतं॒ स्तोमं॑ त्रि॒वृत॒ आप॑ आहु॒स्तास्त्वा॑ रक्षन्तु त्रि॒वृता॑ त्रि॒वृद्भिः॑ ॥ (३)
तीन ह्युलोक, तीन पृथ्वियां, तीन अंतरिक्ष अर्थात्‌ मध्यम लोक, चार सागर, त्रिवृत नाम के तीन प्रकार के स्तोत्र तथा तीन प्रकार के जल ये-सभी त्रिवृत नाम की मणि के साथ तुम्हारी रक्षा करें. (३)
Three hulokas, three earths, three spaces i.e. medium world, four oceans, three types of hymns named Trivrit and three types of water, all of them should protect you with a gem named Trivrit. (3)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
त्रीन्नाकां॒स्त्रीन्स॑मु॒द्रांस्त्रीन्ब्र॒ध्नांस्त्रीन्वै॑ष्ट॒पान् । त्रीन्मा॑त॒रिश्व॑न॒स्त्रीन्त्सूर्या॑न्गो॒प्तॄन्क॑ल्पयामि ते ॥ (४)
हे हिरण्य! रजत और लोहे की तीन प्रकार की मणि धारण करने वाले पुरुष! मैं तीन आकाशों, तीन समुद्रों, तीन आदित्यों, तीन भुवनों, तीन वायुओं तथा तीन स्वर्गो को तेरा रक्षक नियुक्त करता हूं. (४)
O Hiranya! Men wearing three types of silver and iron gems! I appoint three heavens, three seas, three adityas, three bhuvanas, three airs and three heavens as your protectors. (4)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
घृ॒तेन॑ त्वा॒ समु॑क्षा॒म्यग्न॒ आज्ये॑न व॒र्धय॑न् । अ॒ग्नेश्च॒न्द्रस्य॒ सूर्य॑स्य॒ मा प्रा॒णं मा॒यिनो॑ दभन् ॥ (५)
हे अग्नि! मैं होम के साधन घृत से तुम्हें बढ़ाता हुआ तुम्हें घी से सींचता हूं. घृत के कारण वृद्धि प्राप्त अग्नि की, चंद्र की एवं सूर्य की कृपा से हे त्रिवृत मणि धारण करने वाले पुरुष! तेरे प्राणों का अपहरण राक्षस न करें. (५)
O agni! I water you with ghee, increasing you with the means of home. Due to ghrit, the agni, the moon and the sun have increased, O man who wears the trivrita gem! Don't demonize your life. (5)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
मा वः॑ प्रा॒णं मा वो॑ऽपा॒नं मा हरो॑ मा॒यिनो॑ दभन् । भ्रा॑जन्तो वि॒श्ववे॑दसो दे॒वा दैव्ये॑न धावत ॥ (६)
हे पुरुष! तुम्हारे प्राणों की हिंसा मायवी राक्षस न करें. तुम्हारी अपान वायु की हिंसा मायावी राक्षस न करें, हे अग्नि, चंद्र आदि देवो! प्रकाशित होते हुए सभी ज्ञानी देव संबंधी रथ आदि साधन से हमारी प्राण रक्षा के लिए दौड़ कर आएं. (६)
O man! Don't do the violence of your life. Do not make the violence of your own air the elusive demons, O Gods of Agni, Moon etc. While being illuminated, all the knowledgeable gods should run to protect our lives with chariots etc. (6)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
प्रा॒णेना॒ग्निं सं सृ॑जति॒ वातः॑ प्रा॒णेन॒ संहि॑तः । प्रा॒णेन॑ वि॒श्वतो॑मुखं॒ सूर्यं॑ दे॒वा अ॑जनयन् ॥ (७)
पुरुष मुख में स्थित प्राण वायु से अग्नि को संयुक्त करता है. इसलिए प्राण की रक्षा करनी चाहिए. बाहरी वायु मुख में स्थित प्राण वायु से मिलती है. इंद्र आदि देवों ने प्राण वायु से सर्वत्र प्रकाश करने वाले सूर्य को उत्पन्न किया है. (७)
The life in the male mouth combines agni with the air. Therefore, life should be protected. The outer air meets the prana air located in the mouth. Indra etc. gods have created the sun that illuminates everywhere with prana air. (7)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
आयु॑षायु॒ष्कृतां॑ जी॒वायु॑ष्माञ्जीव॒ मा मृ॑थाः । प्रा॒णेना॑त्म॒न्वतां॑ जीव मा मृ॒त्योरुद॑गा॒ वश॑म् ॥ (८)
हे मणिधारक पुरुष! दूसरों की आयु की वृद्धि करने वाले प्राचीन महर्षि तप आदि के द्वारा चिरकाल तक जीवित रहते थे. उन के द्वारा जीवित आयु से तुम जीवित रहो एवं मृत्यु को प्राप्त मत करो. स्थिर आत्मा वालों के प्राणों से तुम जीवित रहो तथा मृत्यु के वश में मत जाओ. (८)
O man of gemstones! The ancient Maharishis, who increased the age of others, lived forever through penance etc. Through them you live from the living age and do not attain death. May you live with the lives of those with stable spirits and do not fall under the control of death. (8)
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