हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.30.1

कांड 5 → सूक्त 30 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
आ॒वत॑स्त आ॒वतः॑ परा॒वत॑स्त आ॒वतः॑ । इ॒हैव भ॑व॒ मा नु गा॒ मा पूर्वा॒ननु॑ गाः पि॒तॄनसुं॑ बध्नामि ते दृ॒ढम् ॥ (१)
मैं समीप के देश से और दूर के देश से तेरे प्राणों को दृढ़ता से बांधता हूं. तू यहीं रह और अपने पूर्ववर्ती पितरों का अनुकरण मत कर. (१)
I bind your life firmly from the nearest country and from the distant country. You stay here and don't follow your previous ancestors. (1)