हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.30.2

कांड 5 → सूक्त 30 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
यत्त्वा॑भिचे॒रुः पुरु॑षः॒ स्वो यदर॑णो॒ जनः॑ । उ॑न्मोचनप्रमोच॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते ॥ (२)
पितृऋण को न चुकाने वाले जिस पुरुष ने तुझ पर अधिकार किया है, मैं उस से छूटने का उपाय अपने मंत्र बल से तुझे बताता हूं. (२)
I tell you with my mantra the way to get rid of the man who has not repaid the father's debt over you. (2)