हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 131
नि शी॑र्ष॒तो नि प॑त्त॒त आ॒ध्यो॒ नि ति॑रामि ते । देवाः॒ प्र हि॑णुत स्म॒रम॒सौ मामनु॑ शोचतु ॥ (१)
हे पत्नी! मैं तेरे सिर से ले कर सारे शरीर में चिंताओं का प्रवेश कराता हूं! देवगण तेरे प्रति कामदेव को भेजें, जिस से दुःखी हो कर तू मेरा चिंतन करे. (१)
O wife! I bring anxieties from your head to the whole body! The gods should send Cupid to you, so that you may think of me as sad. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 131
अनु॑मतेऽन्वि॒दं म॑न्य॒स्वाकू॑ते॒ समि॒दं नमः॑ । देवाः॒ प्र हि॑णुत स्म॒रम॒सौ मामनु॑ शोचतु ॥ (२)
हे सब कर्मो की अनुमति देने वाली देव पत्नी! मुझ पर कृपा करो. हे संकल्प की देवी आकूति! तुम मेरे इस नमस्कार को स्वीकार करो. हे देवो! इस के प्रति कामदेव को भेजो, जिस से दुःखी हो कर यह मेरा स्मरण करे. (२)
O God wife who allows all the deeds! Please impress me. O Goddess of resolve! You accept this greeting of mine. O God! Send Cupid towards this, so that he may remember me in sorrow. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 131
यद्धाव॑सि त्रियोज॒नं प॑ञ्चयोज॒नमाश्वि॑नम् । तत॒स्त्वं पुन॒राय॑सि पु॒त्राणां॑ नो असः पि॒ता ॥ (३)
हे पुरुष! यदि तू यहां से भाग कर तीन योजन दूर चला जाता है, पांच योजन दूर चला जाता है अथवा उतनी दूर चला जाता है, जितनी दूर घोड़ा दिनभर में पहुंच सकता है, तू वहां से भी मेरे पास आ जा और मेरे पुत्रों का पिता बन. (३)
O man! If you run away from here and go three plans away, five plans away or go as far away as the horse can reach throughout the day, you come to me from there too and become the father of my sons. (3)