अथर्ववेद (कांड 7)
व्र॒तेन॒ त्वं व्र॑तपते॒ सम॑क्तो वि॒श्वाहा॑ सु॒मना॑ दीदिही॒ह । तं त्वा॑ व॒यं जा॑तवेदः॒ समि॑द्धं प्र॒जाव॑न्त॒ उप॑ सदेम॒ सर्वे॑ ॥ (४)
हे व्रत के पालन कर्ता अग्नि! दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञकर्मो द्वारा सम्मानित तुम सभी दिनों में प्रसन्न मन वाले हो कर हमारे घर में दीप्त बनो. हे जातवेद अग्नि! भलीभांति दीप्त तुम्हारे चारों और हम पुत्र, पौत्र आदि के साथ बैठें. (४)
O agni that observes the fast! Honored by yajnakarmos like Darshan, Pournamas etc., you should be happy in all the days and become immersed in our house. O jataved agni! Sit around you with our sons, grandsons, etc. (4)