हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
म॒हत्तदुल्बं॒ स्थवि॑रं॒ तदा॑सी॒द्येनावि॑ष्टितः प्रवि॒वेशि॑था॒पः । विश्वा॑ अपश्यद्बहु॒धा ते॑ अग्ने॒ जात॑वेदस्त॒न्वो॑ दे॒व एकः॑ ॥ (१)
देवों ने अग्नि से कहा—“हे अग्नि! वह आवरण विशाल एवं स्थूल था, जिससे लिपटे हुए तुम जलों में प्रविष्ट हुए थे. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे विविध प्रकार के शरीरों को एक देव ने देखा.” (१)
The gods said to the agni, "O agni! The cover was huge and thick, with which you entered the waters wrapped. O Jativeda Agni! One God has seen your various kinds of bodies." (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
को मा॑ ददर्श कत॒मः स दे॒वो यो मे॑ त॒न्वो॑ बहु॒धा प॒र्यप॑श्यत् । क्वाह॑ मित्रावरुणा क्षियन्त्य॒ग्नेर्विश्वाः॑ स॒मिधो॑ देव॒यानीः॑ ॥ (२)
अग्नि ने उत्तर दिया-“मुझे किसने देखा था? वह कौन सा देव है, जिसने मेरे विविध शरीरों को देखा था? हे मित्र और वरुण! मुझ अग्नि की दीप्त एवं देवयज्ञ साधन देह कहां है? यह बताओ.” (२)
The agni replied, "Who saw me?" Which god is he who saw my diverse bodies? Hey friend and Varun! Where is the body of my agni and the divine means of agni? Tell me that." (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
ऐच्छा॑म त्वा बहु॒धा जा॑तवेदः॒ प्रवि॑ष्टमग्ने अ॒प्स्वोष॑धीषु । तं त्वा॑ य॒मो अ॑चिकेच्चित्रभानो दशान्तरु॒ष्याद॑ति॒रोच॑मानम् ॥ (३)
देव कहने लगे-“हे जातवेद अग्नि! जलों और ओषधियों में अनेक प्रकार से घुसे हुए तुम्हें हम कहां खोजें? हे विचित्र किरणों वाले अग्नि! दस आवासस्थानों में अत्यंत प्रकाशमान तुम्हें यम ने पहचान लिया था.” (३)
God said, "O Jativeda Agni! Where do we find you, who have penetrated into the waters and the herbs in many ways? O agni with strange rays! You were recognized by Yama in the ten dwelling places that were very bright." (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
हो॒त्राद॒हं व॑रुण॒ बिभ्य॑दायं॒ नेदे॒व मा॑ यु॒नज॒न्नत्र॑ दे॒वाः । तस्य॑ मे त॒न्वो॑ बहु॒धा निवि॑ष्टा ए॒तमर्थं॒ न चि॑केता॒हम॒ग्निः ॥ (४)
अग्नि बोले-“हे वरुण! मैं हव्य-वहन के कार्य से डरकर यहां आ गया हूं. मैं चाहता हूं कि देवगण मुझे पहले के समान हव्य वहन के कार्य में न लगावें. इसी भय के कारण मेरा शरीर अनेक प्रकार से जल में छिपा है. मैं अब यह हव्यवहन का काम स्वीकार नहीं करूंगा.” (४)
Agni said, "O Varun! I have come here afraid of the act of carrying the haavya. I don't want the Devas to engage me in the same task of carrying the same thing as before. Because of this fear, my body is hidden in the water in many ways. I will no longer accept this act of conveyance." (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
एहि॒ मनु॑र्देव॒युर्य॒ज्ञका॑मोऽरं॒कृत्या॒ तम॑सि क्षेष्यग्ने । सु॒गान्प॒थः कृ॑णुहि देव॒याना॒न्वह॑ ह॒व्यानि॑ सुमन॒स्यमा॑नः ॥ (५)
देवों ने कहा-“हे अग्नि! आओ, यजमान देवों का अभिलाषी एवं यज्ञ करने का इच्छुक है. तुम तेजपुंज को धारण करते हुए भी अंधकार में हो. देवों के प्रति आने वाले लोगों का मार्ग सरल बनाओ एवं प्रसन्नचित्त होकर हव्य-वहन करो. (५)
The gods said, "O agni! Come, the host desires the gods and is willing to perform yajna. You are in darkness even while holding the radiant mass. Make the way of those who come towards the gods easy and be happy and carry the greetings. (5)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
अ॒ग्नेः पूर्वे॒ भ्रात॑रो॒ अर्थ॑मे॒तं र॒थीवाध्वा॑न॒मन्वाव॑रीवुः । तस्मा॑द्भि॒या व॑रुण दू॒रमा॑यं गौ॒रो न क्षे॒प्नोर॑विजे॒ ज्यायाः॑ ॥ (६)
अग्नि ने कहा-“हे देवो! रथी जिस प्रकार मार्ग पर चला जाता है, उसी प्रकार मेरे तीन भाई क्रमशः हव्य-वहन करते हुए समाप्त हो गए. हे वरुण! इसी डर से मैं दूर चला आया हूं. गौरमृग जिस प्रकार धनुर्धारी की ज्या से डरता है, उसी प्रकार मैं हव्य वहन कार्य से कांपता हुं.” (६)
The agni said, "O gods! Just as the charioteer goes down the road, so my three brothers respectively ended up bearing the hawya. Hey Varun! It's this fear that I've come away. Just as the gourd is afraid of the archer's sine, so I tremble with the work of carrying out the wind." (6)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
कु॒र्मस्त॒ आयु॑र॒जरं॒ यद॑ग्ने॒ यथा॑ यु॒क्तो जा॑तवेदो॒ न रिष्याः॑ । अथा॑ वहासि सुमन॒स्यमा॑नो भा॒गं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विषः॑ सुजात ॥ (७)
देवों ने कहा-“हे अग्नि! हम तुम्हें जरारहित आयु प्रदान करते हैं. हे जातवेद! इस आयु से युक्त होकर तुम नहीं मरोगे. हे शोभन जन्म वाले अग्नि! तुम प्रसन्नचित्त होकर यजमान द्वारा दिए गए हव्य का भाग देवों के पास ले जाओ.” (७)
The gods said, "O agni! We give you a lifeless age. O Jathaveda! You won't die of this age. O agni of glory born! Be glad to take the portion of the promise given by the host to the gods." (7)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
प्र॒या॒जान्मे॑ अनुया॒जाँश्च॒ केव॑ला॒नूर्ज॑स्वन्तं ह॒विषो॑ दत्त भा॒गम् । घृ॒तं चा॒पां पुरु॑षं॒ चौष॑धीनाम॒ग्नेश्च॑ दी॒र्घमायु॑रस्तु देवाः ॥ (८)
अग्नि ने कहा—“हे देवो! तुम मुझे यज्ञ के प्रारंभ वाले, अंत वाले तथा असाधारण हव्य भाग अधिक मात्रा में दो. तुम मुझे जल का सार अंश घृत, ओषधियों से उत्पन्न प्रधान भाग एवं दीर्घ आयु दो.” (८)
The agni said, "O gods! You give me more of the beginning, the end and the extraordinary parts of the yajna. You give me the essence of water, the principal part of the water produced by the herbs and the long life." (8)
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