हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 129
प्र॑ती॒पं प्राति॑ सु॒त्वन॑म् ॥ (२)
खुवा प्रतीप को संपन्न करता है. (२)
Khuva endows the pratip. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 129
हरि॑क्नि॒के किमि॑च्छसि ॥ (४)
हे हरिक्निका! तेरी क्या इच्छा है? (४)
O Haricnica! What do you wish? (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 129
सा॒धुं पु॒त्रं हि॑र॒ण्यय॑म् ॥ (५)
हे पुत्र! साधु को स्वर्ण दो. (५)
O son! Give gold to the monk. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 129
क्वाह॑तं॒ परा॑स्यः ॥ (६)
अवाहत अर्थात्‌ घायल हुआ परास्य कहां है? (६)
Where is the injured parasya? (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 129
यत्रा॒मूस्तिस्रः॑ शिंश॒पाः ॥ (७)
इस स्थान पर तीन शिंशिपा वृक्ष हैं. (७)
There are three Shinshipa trees at this place. (7)
Page 1 of 3Next →