हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

अध्याय 40 के सभी मंत्र

यजुर्वेद अध्याय 40 के सभी मंत्र हिंदी अर्थ के साथ

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
ई॒शा वा॒स्यमि॒दंꣳ सर्वं॒ यत्किञ्च॒ जग॑त्यां॒ जग॑त्।तेन॑ त्य॒क्तेन॑ भुञ्जीथा॒ मा गृ॑धः॒ कस्य॑ स्वि॒द्धन॑म् ॥ (१)
इस जड़चेतन जगत्‌ में जो कुछ भी है, वह ईश्वर की कृपा से है. उस ईश्वर के द्वारा त्यागे गए का भोग कीजिए. बहुत ज्यादा लालच मत करो. यह धनादि सब किस का है? (अर्थात्‌ ईश्वर के अलावा किसी का नहीं). (१)
Whatever is in this root conscious world is by the grace of God. Enjoy the one forsaken by that God. Don't covet too much. Whose wealth all this belongs to? (i.e. of none other than God). (1)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तꣳ समाः॑।ए॒वं त्वयि॒ नान्यथे॒तोऽस्ति॒ न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑ ॥ (२)
हे ईश्वर! हम कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें. इस के अलावा कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है. कर्म मनुष्य को लिप्त नहीं करते. (२)
O God! Let us want to live for a hundred years while doing karma. Apart from this, there is no other path to welfare. Deeds do not involve human beings. (2)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
अ॒सु॒र्य्याः᳕ नाम॒ ते लो॒काऽअ॒न्धेन॒ तम॒सावृ॑ताः। ताँस्ते प्रेत्यापि॑ गच्छन्ति॒ ये के चा॑त्म॒हनो॒ जनाः॑ ॥ (३)
जो गहन अंधकार से घिरे रहते हैं, वे लोग असुर्य कहलाते हैं. जो आत्मा का हनन करने बाले हैं, वे लोग प्रेत रूप में वैसे ही लोकों को प्राप्त होते हैं. (३)
Those who are surrounded by deep darkness are called asurayas. Those who are going to violate the soul, they get the same worlds in the form of ghosts. (3)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
अने॑ज॒देकं॒ मन॑सो॒ जवी॑यो॒ नैन॑द्दे॒वाऽआ॑प्नुव॒न् पूर्व॒मर्ष॑त्।तद्धाव॑तो॒ऽन्यानत्ये॑ति॒ तिष्ठ॒त्तस्मि॑न्न॒पो मा॑त॒रिश्वा॑ दधाति ॥ (४)
अजन्मा ईश्वर एक है. वह मन से भी ज्यादा गतिवान और फुरतीला है. देवगण भी इसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं. स्थिर रह कर भी वह दौड़ता हुआ गतिशीलों को पछाड़ देता है. वह जल में रहता है. वायु को धारण करता है. (४)
The unborn God is one. She is more dynamic and agile than the mind. Devgans are also not able to achieve this. Even when it is still, it beats the moving dynamics. He lives in water. It holds air. (4)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
तदे॑जति॒ तन्नैज॑ति॒ तद् दू॒रे तद्व॑न्ति॒के।तद॒न्तर॑स्य॒ सर्व॑स्य॒ तदु॒ सर्व॑स्यास्य बाह्य॒तः ॥ (५)
"बह (परम तत्त्व) गतिशील है और स्थिर भी है. बह दूर भी है और निकट भी है बह जड़ और चेतन दोनों के भीतर भी है और बाहर भी है. (५)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
यस्तु सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति।स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति ॥ (६)
जो सभी प्राणियों (जड्चेतन) में अपने को (आत्मतत्त्व को) देखता है तथा उस का अनुभव करता है, उसे कभी भी कोई भ्रम नहीं होता. (६)
One who sees and experiences himself (atma-tattva) in all beings (subconscious) never has any illusions. (6)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
यस्मि॒न्त्सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मैवाभू॑द्विजान॒तः।तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽएकत्वम॑नु॒पश्य॑तः ॥ (७)
जिस (स्थिति) में मनुष्य यह जान लेता है कि सभी भूतों में एक ही आत्मतत्त्व है, तब क्या मोह? क्या शोक ? उसे सर्वत्र एक जैसी स्थिति दिखाई देती है. (७)
What is the attachment when man knows that all beings have the same self-essence? What sorrow? He sees the same situation everywhere. (7)

यजुर्वेद (अध्याय 40)

यजुर्वेद:
स पर्य॑गाच्छु॒क्रम॑का॒यम॑व्र॒णम॑स्नावि॒रꣳ शु॒द्धमपा॑पविद्धम्।क॒विर्म॑नी॒षी प॑रि॒भूः स्व॑य॒म्भूर्या॑थातथ्य॒तोऽर्था॒न् व्यदधाच्छाश्व॒तीभ्यः॒ समा॑भ्यः ॥ (८)
वह परमपिता सर्वव्यापक, चमकीला, दीप्तिमान, काया रहित, नाड़ियों से रहित है. वह घावों से रहित, पवित्र, पाप रहित, विद्वान्‌, मननशील, सर्वव्यापक व स्वयंभू (स्वयं उत्पन्न होने वाला) है. उस ने सृष्टि के आरंभ से ही सब के लिए यथायोग्य साधन सुविधाओं की व्यवस्था की है. (८)
The Supreme being is omnipresent, bright, radiant, without body, devoid of nerves. He is free from wounds, divine, without sin, scholarly, contemplative, omnipresent and self-sufficient. He has provided suitable facilities for everyone since the beginning of creation. (8)
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